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हिंदू एकता हिंदू एकता हिंदू एकता
हिंदू एकता
हिंदू एकता (Hindu Ekta) हिंदू एकता (Hindu Ekta) का अर्थ है जाति, भाषा और क्षेत्र से ऊपर उठकर सभी हिंदुओं को एक साथ लाना, सनातन धर्म के आदर्शों को अपनाना और सांस्कृतिक मूल्यों के आधार पर समाज में समरसता, शक्ति और स्वाभिमान स्थापित करना, जिसके लिए विभिन्न संगठन और यात्राएं (जैसे बागेश्वर धाम की यात्रा) काम कर रही हैं, ताकि एक मजबूत और एकजुट हिंदू समुदाय का निर्माण हो सके, जो राष्ट्र की प्रगति में योगदान दे.
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हिंदू एकता (Hindu Ekta) हिंदू एकता (Hindu Ekta) का अर्थ है जाति, भाषा और क्षेत्र से ऊपर उठकर सभी हिंदुओं को एक साथ लाना, सनातन धर्म के आदर्शों को अपनाना और सांस्कृतिक मूल्यों के आधार पर समाज में समरसता, शक्ति और स्वाभिमान स्थापित करना, जिसके लिए विभिन्न संगठन और यात्राएं (जैसे बागेश्वर धाम की यात्रा) काम कर रही हैं, ताकि एक मजबूत और एकजुट हिंदू समुदाय का निर्माण हो सके, जो राष्ट्र की प्रगति में योगदान दे.
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हिंदू एकता (Hindu Ekta) हिंदू एकता (Hindu Ekta) का अर्थ है जाति, भाषा और क्षेत्र से ऊपर उठकर सभी हिंदुओं को एक साथ लाना, सनातन धर्म के आदर्शों को अपनाना और सांस्कृतिक मूल्यों के आधार पर समाज में समरसता, शक्ति और स्वाभिमान स्थापित करना, जिसके लिए विभिन्न संगठन और यात्राएं (जैसे बागेश्वर धाम की यात्रा) काम कर रही हैं, ताकि एक मजबूत और एकजुट हिंदू समुदाय का निर्माण हो सके, जो राष्ट्र की प्रगति में योगदान दे.

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हिंदू एकता (Hindu Ekta)

हिंदू एकता (Hindu Ekta) का अर्थ है जाति, भाषा और क्षेत्र से ऊपर उठकर सभी हिंदुओं को एक साथ लाना, सनातन धर्म के आदर्शों को अपनाना और सांस्कृतिक मूल्यों के आधार पर समाज में समरसता, शक्ति और स्वाभिमान स्थापित करना, जिसके लिए विभिन्न संगठन और यात्राएं (जैसे बागेश्वर धाम की यात्रा) काम कर रही हैं, ताकि एक मजबूत और एकजुट हिंदू समुदाय का निर्माण हो सके, जो राष्ट्र की प्रगति में योगदान दे.

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हिंदू धर्म (सनातन धर्म) की उत्पत्ति कहां से हुई

हिंदू धर्म के अनुसार ब्रह्मांड की ...हिंदू धर्म (सनातन धर्म) की उत्पत्ति किसी एक व्यक्ति या घटना से नहीं हुई, बल्कि यह भारत की प्राचीन सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं का एक विकास है, जिसकी जड़ें सिंधु घाटी सभ्यता (2300-1500 ईसा पूर्व) और वैदिक काल (1500-500 ईसा पूर्व) में पाई जाती हैं, जहाँ वेदों की रचना हुई, और कई हिंदू मानते हैं कि यह कालातीत है और हमेशा से अस्तित्व में है, जो ऋग्वेद के सबसे पुराने मंत्रों से जुड़ा है

ब्रह्मा के पुत्र

विष्वकर्मा, अधर्म, अलक्ष्मी, आठवसु, चार कुमार, 14 मनु, 11 रुद्र, पुलस्य, पुलह, अत्रि, क्रतु, अरणि, अंगिरा, रुचि, भृगु, दक्ष, कर्दम, पंचशिखा, वोढु, नारद, मरिचि, अपान्तरतमा, वशिष्‍ट, प्रचेता, हंस, यति आदि मिलाकर कुल 59 पुत्र थे ब्रह्मा के। ब्रह्मा के प्रमुख पुत्र : 1.मन से मारिचि। 2.नेत्र से अत्रि। 3.मुख से अंगिरस। 4.कान से पुलस्त्य। 5.नाभि से पुलह। 6.हाथ से कृतु। 7.त्वचा से भृगु। 8.प्राण से वशिष्ठ। 9.अंगुष्ठ से दक्ष। 10.छाया से कंदर्भ। 11.गोद से नारद। 12.इच्छा से सनक, सनन्दन, सनातन और सनतकुमार। 13.शरीर से स्वायंभुव मनु और शतरुपा। 14.ध्यान से चित्रगुप्त।

कश्यप ऋषि

कश्यप ऋषि एक वैदिक ऋषि थे। इनकी गणना सप्तर्षि गणों में की जाती थी। इनके वंशज ही सृष्टि के प्रसार में सहायक हुए। इनके पिता ब्रह्मा के पुत्र मरीचि ऋषि थे। इन्हें परमपिता ब्रह्मा का अवतार माना गया है। द्वापर युग में कश्यप प्रजापति ही भगवान विष्णु के कृष्णावतार में उनके पिता वसुदेव थे तथा उनकी प्रथम पत्नी अदिति देवकी और उनकी द्वितीय पत्नी दिति रोहिणी थीं। ब्रह्मा के सात मानस पुत्रों में से एक 'मरीचि' थे जिसने कश्यप ऋषि उत्पन्न हुए। कश्यप ने दक्ष प्रजापति की १७ पुत्रियों से विवाह किया। दक्ष की इन पुत्रियों से जो सन्तान उत्पन्न हुई अदिति, दिति, दनु, अनिष्ठा, काष्ठा, सुरसा, इला,, मुनि,सुरभि,कद्रू,विनता,यामिनी, ताम्रा, तिमि, क्रोधवशा, सरमा, पातंगी, मार्कण्डेय पुराण और भागवत पुराण के अनुसार तेरह पत्नियां महाभारत और विष्णु पुराण के अनुसार कश्यप की सत्रह पत्नियां थीं जबकि भागवत पुराण और मार्कण्डेय पुराण के अनुसार कश्यप की तेरह पत्नियां थीं और मत्स्य पुराण के अनुसार नौ। एक परम्परा के अनुसार देवता, दैत्य, दानव, यक्ष, गंधर्व, रक्षा, नाग इन सभी जीवधारियों की उत्पत्ति कश्यप से हुई।

हिन्दू धर्म का इतिहास, हिन्दू की उत्पति कैसे हुई ?

इतिहास भारत के वैदिक धर्म से आरम्भ होता है

हिन्दू समुदाय पिंडिती का है का इतिहास सबसे आधुनिक है।[1][2][3][4] इस धर्म को वेदकाल से भी पूर्व का माना जाता है, क्योंकि वैदिक काल और वेदों की रचना का काल अलग-अलग माना जाता है। यहां शताब्दियों से मौखिक (तु वेदस्य मुखं) परंपरा चलती रही, जिसके द्वारा इसका इतिहास व ग्रन्थ आगे बढ़ते रहे। उसके बाद इसे लिपिबद्ध (तु वेदस्य हस्तौ) करने का काल भी बहुत लंबा रहा है। हिन्दू धर्म के सर्वपूज्य ग्रन्थ हैं वेद। वेदों की रचना किसी एक काल में नहीं हुई। वेदों के रचनाकाल का आरंभ ८वी सदी से हुआ है। यानि यह धीरे-धीरे रचे गए और अंतत: पहले वेद को तीन भागों में संकलित किया गया- ऋग्वेदयजुर्वेद और सामवेद जि‍से वेदत्रयी कहा जाता था। कहीं कहीं ऋग्यजुस्सामछन्दांसि को वेद ग्रंथ से न जोड़ उसका छंद कहा गया है। मान्यता अनुसार वेद का वि‍भाजन राम के जन्‍म के पूर्व पुरुंरवा राजर्षि के समय में हुआ था। बाद में अथर्ववेद का संकलन ऋषि‍ अथर्वा द्वारा कि‍या गया। वहीं एक अन्य मान्यता अनुसार कृष्ण के समय में वेद व्यास कृष्णद्वैपायन ऋषि ने वेदों का विभाग कर उन्हें लिपिबद्ध किया था। मान्यतानुसार हर द्वापर युग में कोई न कोई मुनि व्यास बन वेदों को 4 भागों में बाटते हैं।

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वेद

पुराण

अठारह पुराण बताये गये हैं। १. ब्रह्मपुराण, २. पद्मपुराण, ३. विष्णुपुराण, ४. शिवपुराण, ५. भागवतपुराण, ६. भविष्यपुराण, ७. नारदपुराण, ८. मार्कण्डेयपुराण, ९. अग्निपुराण, १०. ब्रह्मवैवर्तपुराण, ११. लिंगपुराण, १२. वाराहपुराण, १३. स्कन्दपुराण, १४. वामनपुराण, १५. कृर्मपुराण, १६. मत्स्यपुराण, १७. गरुडपुराण और १८. ब्रह्माण्डपुराण[4]

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सप्त ऋषि

कश्यपोऽत्रिर्वसिष्ठश्च विश्वामित्रोऽथ गौतमः।

जमदग्निर्भरद्वाज इति सप्तर्षयः स्मृताः ॥

(कश्यप, अत्रि, वसिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि, भारद्वाज – ये सात ऋषि हैं।)

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ऋषि सप्त ऋषि कश्यपोऽत्रिर्वसिष्ठश्च विश्वामित्रोऽथ गौतमः। जमदग्निर्भरद्वाज इति सप्तर्षयः स्मृताः ॥ (कश्यप, अत्रि, वसिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि, भारद्वाज – ये…

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